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Wednesday, June 6, 2018

गुरुओं ने कहा था "पवन गुरु, पानी पिता, माता धरत महत..."

लेकिन प्रकृति का क्या हाल कर दिया हमने---

पंजाब के पानी में भी घोली जा चुकी है प्रदुषण की ज़हर
लुधियाना: 6 जून, 2018: कार्तिका सिंह 

 कभी तेज धुप तो कभी झमाझम बारिश। कभी कंपकंपाती सर्दी और चारो तरफ धुंध तो अगले ही पल आसमान साफ़...... यह चमत्कार नहीं; कोप है प्रकृति का।  विकास के नाम पर प्रकृति से छेड़छाड़  सालों से होती रही है।  विकास कितना हुआ यह देखने की बात है पर इस दौरान प्रकृति के साथ हमने क्या किया-----यह सोचने की बात है।  

आज  न शुद्ध पानी है, न हवा और न ही शांत स्वच्छ वातावरण। एक ऐसे देश में जहाँ गंगा यमुना को माता माना जाता है और यहाँ की नदी में कलकल बहता जल आस्था का विषय है।  उस देश में गंगा नदी की हालत हमने ऐसी कर दी है, की पीना या नहाना तो दूर उस पानी को देखना भी अब बुरा लगता है।  
                                                                 घर आंगन में तुलसी और पीपल के पौधों को पूजने वाले हम लोगो ने बड़ी बड़ी इमारतो को खड़ा करने के लिए पेड़ों को सरे आम कटवा कर अपने रस्ते से हटवा दिया।  लगातार अलग अलग कारणों से हम पेड़ काटते रहे. इसके लिए हम नए नए बहाने भी ढूँढ़ते रहे। यह एक ऐसा पाप था--एक ऐसा अपराध जिसकी वजह से ग्लोबल वार्मिंग का स्तर बड़ा।  इससे भौगोलिक और पर्यावरणीय असंतुलन पैदा हो गया।  स्थिति भयानक होने के बावजूद हम लगातार अपनी सुविधा और हित के लिए पेडों को काट रहे है।  पेड़ कह रहा है--- "पेड़ हूँ मैं, जानता हूँ प्रकृति के नियम को, काटे हो जब मुझको, तो काटते हो तुम स्वयं को।" हमने कभी पेडों की या नदियों की चेतावनी नहीं सुनी। हमने अपनी अंतर् आत्मा से उठीं ऐसी सभी आवाज़ों को भी अनसुना कर दिया। गुरु ग्रन्थ साहिब में लिखा है ------" पवन गुरु , पानी पिता, माता धरत महत "  अर्थात हवा को गुरु , पानी को पिता और धरती को माँ का दर्जा दिया गया है।  लेकिन कितने लोगों ने इसे अपने जीवन में उतारा?
             हम अधिक विकास की रफ़्तार के चलते तेजी से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहे है।  पृथ्वी पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों और उन संसाधनों के दोहन में अत्यधिक अंतर है।  अत्यधिक दोहन के चलते शीघ्र ही प्राकृतिक संसाधनों के भण्डार समाप्ति के कगार पर पहुँच जायेगा। लगातार बढ़ती गाडियों की संख्या से वायु प्रदूषण बढ़ गया है।  सांस लेना मुश्किल हो गया है।  वन्य जीवो का अस्तित्व भी खतरे में पड़ गया है।  बार - बार आग लगने के कारण छोटे वनस्पतियों की कई प्रजातियाँ ही समाप्त  गयी है।  खेतो में भारी मात्रा में रासायनिक उर्वरको के पर्योग से भूमि बंजर होती जा रहगी है।  परंपरागत खादों का उपयोग लगभग बांध हो गया है।  भू - जल स्तर तेजी से गिरता जा रहा है भूमि में हो रहे बोर-पम्प के कारण भूगार्भिक जल का स्तर तेजी से घटता जा रहा है।  
                       इस समस्या को समझते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने  1972 में स्टोकहोम में आयोजित एक कांफ्रेंस  द्वारा विशव प्रयावरण दिवस का सुझाव संसार के सन्मुख प्रस्तुत किया।  वर्ष 1973 में 5 जून को विशव प्रयावरण दिवस मनाया गया।  तब से ले कर हर वर्ष इसी दिन पुरे संसार में विशव प्रर्यावरण दिवस मनाया जाता है।  अब जब पुरी दुनिया में इस दिन को मनाया जाने लगा है, तो -- हमारे लिए ये सोचने की बात है , कि आखिर हमें शुद्ध पानी, हवा और शांत वातावरण को नुक्सान पहुचाकर विकास चाहिए या नहीं।  क्या हमें संयुक्त राष्ट्र के इस साल के स्लोगन " बीट प्लास्टिक पाल्यूशन " थीम पर सोचने और अमल करने की ज़रुरत है या नहीं।  और काबिल - ऐ - ज़िक्र है कि हमारा देश इस साल विशव पर्यावरण दिवस की मेजबानी कर रहा है। 
                                                            पर हर बार की तरह 5 जून , प्रयावरण दिवस इस बार भी गुजर गया।  मना लिया होगा , अच्छे से , है न----- पर गेती , फावड़े , संरक्षण की चिंताए, प्रयावरण को संभालने की फ़िक्र तो नहीं रख दी न ?---- कि अब अगले साल तक तो फुर्सत मिली।   भूल जाईये ! अब ये फुर्सत , आराम हमारे हिस्से में नहीं रहा।  जो हालत हमने दुनिया की बना ली है , उसमे कई दशको तक दुनिया का ख्याल रखे जाने की ज़रुरत है।  इक्का - दुक्का परवाह से अब काम न चलेगा।  फिर संग आने के लिए एक 5 जून काफी न होगा।  इमारते खड़ी हो रही है , नदिया सूख रही है।  खेत घटते जा रहे रहे है , पेड़ नज़र से परे हो रहे है।  कचरा ज़मा हो रहा है , छांटा -बांटा भी जा रहा है , पर कम कहाँ हो रहा है ? सीमेंट की हमारी बसाहटो में , प्लास्टिक की सजावट हो रही है , जो प्रकृति का सबसे बड़ा दुश्मन है।  
                 हम इन्सान पृथ्वी के दुसरे प्राणियों की तुलना में खुद को बहुत प्रगतिसंपन , विचारशील और संवेदनशील मानते है।  वो जो पिछरे हुए प्राणी है , वह प्रकृति को संभाले हुए है , हैरत होती है न।  जिसे हमने तरक्की समझा , उसमे कुदरत को शामिल ही नहीं किया।  जब तक कुदरत के साथ थे ,खुश थे -- अब पराजित हैं , बीमार हैं।  करीब 200 बर्षों तक हमने जो सीखा, विकास के नए नए प्रतिमान गढ़ लिए लेकिन यह सभी प्रतिमान हमारे नहीं थे--विदेशों के थे।  अब अगले एक दशक में उसकी परीक्षा देनी है।  पहाड़ों को काटने , सागर का सीना चीरने, नदियों के परवाह पर नियंत्रण रखने और हवाओ के रुख को मोड़ देने का दमखम रखने वाले--- इस प्रथ्वी के सबसे समझदार प्राणी, हम इंसानों को अपने ग्रह को प्लास्टिक में डूबने , सूखे से तिड़कने  और भूख से तड़पने से रोकने की चुनौती का सामना करना होगा।  हर इन्सान को प्रयावरण का मित्र बनना होगा।  जीवन की चाह में प्रकृति की हत्या को रोकना होगा।   

       इसी बीच केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री डॉ. हर्ष वर्धन ने कहा है कि प्रदूषण और पर्यावरण संबंधित विषयों पर कानून और अधिनियम पारित किए जा चुके हैं और अब लोगों को इस पर अमल करना है। विश्‍व पर्यावरण दिवस समारोह के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए डॉ. हर्ष वर्धन ने आज यहां कहा कि पर्यावरण की देखभाल करना भारत की समृद्ध विरासत रही है। उद्घाटन सत्र नेचुरल केपिटल ऑफ इंडिया विषय पर आयोजित किया गया था। उन्‍होंने आगे कहा कि हमारे देश में भूमि, पेड़ और नदियों को दिव्‍य आशीर्वाद के हिस्‍से के रूप में समझा जाता है और इन्‍हें प्राकृतिक उपहार के रूप में देखा जाता है, जिन्‍हें संरक्षित और पोषित करने की आवश्‍यकता है। मंत्री महोदय ने कहा कि प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति को पर्यावरण के लिए कार्य करने के संदर्भ में प्रेरित किया जाना चाहिए और व्‍यक्‍तियों के छोटे योगदानों से एक वृहद कार्य पूरा किया जा सकता है।

ग्रीन गुड डीड्स पहल के सकारात्‍मक प्रभाव का वर्णन करते हुए डॉ. वर्धन ने कहा कि इस पहल को पूरे विश्‍व स्‍तर पर लागू किया जाना चाहिए। इस पहल को ब्रिक्‍स और अंतर्राष्‍ट्रीय विश्‍वविद्यालयों द्वारा सराहना मिली है।

संयुक्‍त राष्‍ट्र पर्यावरण के कार्यकारी निदेशक श्री एरिक सोल्‍हेम ने अपने संबोधन में ग्रीन गुड डीड्स के प्रति डॉ. हर्ष वर्धन के दृष्‍टिकोण को सराहते हुए कहा कि पर्यावरण पर परिचर्चा घर-घर में होनी चाहिए।    

                                                   

Monday, September 11, 2017

जीना इसी का नाम है.....

पीएयू के सुसाईड प्रिवेंशन आयोजन ने सिखाये ज़िंदगी के असली गुर 
लुधियाना: 16 सितंबर 2017: (कार्तिका सिंह)::
मन की दुनिया अजीब दुनिया है;
रंग कितने ही यह बदलती है। 
यह पंक्तियाँ इन दिनों की अख़बार में छपी खबरें देख कर पहले मन में उठीं और फिर जुबां पर आयी। कहीं बेटा बाप की हत्या कर रहा है और कहीं कोई बेटा मां को कत्ल कर रहा है। पैसे की पूजा करने वाले पूंजीवाद में यही सब हो सकता है। रिश्तों और जज़्बातों की कदर पूँजी प्रधान युग में कहां! 
हां वहीँ कभी कभी अच्छीे ख़बरें भी आती हैं। वो लोग भी रिश्ते बनाते और निभाते हैं जिनका किसी से खून का कोई रिश्ता नहीं होता। दुनिया के इन बदलते चेहरों को देख कर ही अहसास होता है मन की शक्ति का। मन को वश में किया तो पैरों तले ज़माना और अगर मन के पीछे हो लिए तो कुछेक हालतों को छोड़ कर ज़माने के पैरों तले हम। जब भी किसी समाचार पत्र में किसी की आत्महत्या की खबर छपी नज़र आती तो मन विचलित हो उठता। किसी का मन किसी का दिमाग किसी को मौत की राह पर कैसे ले जाता है। कदम कदम पर फैले शोषण के जाल ने ऐसे बहुत से हालात बनाये हैं। ज़रा सोचो उस मानसिक स्थिति को जब कोई मरने का फैसला करता है। ज़रा सोचो कैसे कोई खुद की जान ले सकता है? आखिर क्यों महसूस होता है इतना गम, इतना दर्द जो जान ले कर हो हटता है।  कारण बाहरी भी हैं लेकिन मन की भूमिका बहुत बड़ी होती है। तभी कहा जाता है शायद---मन के जीते जीत है--मन के हारे हार। 
आत्म हत्यायों की खबरों से दिल और दिमाग दोनों परेशान थे। उदासी बढ़ रही थी। समझ नहीं आ रही थी कि किसी को आत्महत्या से कैसे रोका जा सकता है। इसी उधेड़बुन में पता चला कि पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी एक प्रतियोगिता करवा रही है कि आत्म हत्यायों को कैसे रोका जाये? इसकी जानकारी मिलने पर मन में ख़ुशी की एक लहर उठी। काव्य रचना की मन में छुपी भूली बिसरी चाहत सक्रिय हुयी और एक पंजाबी काव्य रचना लिखी गयी।
उन दिनों पंचकूला में डेरा सच्चा सौदा के विवाद को लेकर हिंसक हालात  बने हुए थे। इंटरनेट बंद था। इसलिए लगा कि मेरा तो इस प्रतियोगिता में भाग लेना ही मुश्किल। कार्यालय में छुट्टी थी और इंटरनेट बंद। बहुत ही बेबसी की हालत बनी हुई थी। तभी एक अच्छी खबर आई। ज़रा सा हालात ठीक होते ही पीएयू ने इस प्रतियोगिता की अंतिम तारीख बढ़ाने का ऐलान कर दिया। कालेज के प्रोफेसरों ने होंसला दिया। बस मुझे तो जान में जान आयी। लगा मुझे अब अवश्य ही भाग लेना चाहिए। बहुत बार मन को बदला भी। फिर दिल के किसी कोने से आवाज़ आती शायद कंसोलेशन या एपरीसेशन पुरस्कार ही मिल जाये। बस एक दम से वो पंजाबी रचना प्रतियोगिता में भेज दी। अब बेसब्री से इंतज़ार था प्रतियोगिता के परिणाम का। 
मुझे याद है कि जिस दिन यह परिणाम आया उस दिन भी मेरे पापा हिमाचल में थे। मुझ से रहा नहीं गया और व्हाटसप पर अपनी ख़ुशी पापा को बताई।  पापा भी बहुत खुश हुए। 
जिस दिन इन परिणामों की घोषणा हुयी वो दिन तो मेरे लिए अविस्मरणीय ही बन गया। कालेज की मेरी प्रोफेसर और प्रिंसिपल दोनों ही मुझे आशीर्वाद देने के लिए विशेष तौर पर आये हुए थे। इससे मेरी ख़ुशी भी चौगुनी हुई और गर्व भी। उसी कार्यक्रम में जब मेरी कविता को बहुत ही प्रभावशाली ढंग से स्टेज पर पढ़ा भी गया और स्क्रीन पर दिखाया भी गया तो मुझे बहुत ही प्रसन्नता हुयी।  इससे ज़्यादा ख़ुशी उस जानकारी की मिली जो शायद मुझे वहीँ पर मिल ही नहीं सकती थी। पत्रकारिता विभाग के डाक्टर सरबजीत सिंह और होम साइंस विभाग की मैडम जतिंदर कौर गुलाटी ने तो कमाल की बातें बतायीं जिनमें कमाल का जादू था। ऐसा जादू जो आत्महत्या के लिए जा रहे इंसान को वापिस ज़िंदगी के जोश में ले आये। 
इसी तरह जानमाने शायर पद्मश्री डाक्टर सुरजीत पात्र साहिब ने बहुत ही सच्चा सुच्चा और वैज्ञानिक तथ्य बताया कि  जैसे कोई भी खतरनाक ज़हर अगर बहुत से पानी में मिला दिया जाए तो उसकी मार्क क्षमता तकरीबन समाप्त जैसी ही हो जाती है। उन्होंने समझाया कि इसी तरह अगर हम अपने दर्द को ही सबसे बड़ा दर्द समझ कर गले लगाएंगे तो वो खतरनाक ज़हर ही बन जायेगा जो ख़ुदकुशी की तरफ जाता है। लेकिन अगर दुनिया भर के गम को या दूसरों के गम को भी अपने ही गम इन शामिल कर लिया जाये तो अचानक ही अपना गम का सागर बहुत छोटी सी बूंद जैसा बन जाता है। उसकी मार्कक्षमता समाप्त हो जाती है। पात्र साहिब के इस हिसाब किताब को सुन कर याद आया वह गीत----
                                                              किसी की मुस्कराहटों पे हो निसार, 
                                                              किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार,
                                                              किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार-----
                                                              जीना इसी का नाम है-----
तब से मेरी अंतर्मन की जो आंख केवल अपना ही दर्द देख रही थी वही आंख अब दूसरों के दर्द को भी देखने लगी। कुछ ही दिनों में मुझे अपना दर्द--अपना गम जो बहुत बड़ा लगता था अब एक तरह से भूल जैसा ही गया था।
उसी कार्यक्रम में डाक्टर सुखपाल साहिब का पेपर भी पढ़ा गया था। कमाल की जानकारी दी गयी इस खोज पत्र में। खुदकुशियों का इतना विस्तृत विवरण शायद किसी अख़बार में नहीं आया। खुदकुशियों के इस अभियान से जुड़ कर ही पता चला कि  वास्तव में मामला है क्या? मैं कोशिश करूंगी कि  इस पर जल्द ही कोई नयी पोस्ट लिखी जाये। फिलहाल इतना ही कि अपना सुःख  और दूसरों का दुःख बाटना आ जाये तभी पता चलता है-- जीना इसी का नाम है... 

Monday, November 14, 2016

बाल दिवस पर डॉक्टर रमेश ने की एक अनोखी पहल

सन 2030 तक दंगे फसादों से मुक्त समाज बनाने का शुभारम्भ 
लुधियाना: 14 नवम्बर 2016: (कार्तिका सिंह//मन की दुनिया मन के रंग)
बहुत बड़ी शक्ति छुपी है मन में। मन जो चाहे करने की क्षमता रखता है। इसे जीत लिया जाये तो दुनिया जीतने की क्षमता पैदा हो जाती है। मन किसी से मिलना चाहे तो तन बरसात में भी उठ कर उसका साथ देता है और चल पड़ता है मिलने।  रास्ते का कीचड़ और  बारिश का  कुछ कहता। अगर मन न मिलना चाहे तो तन भी बीमार हो सकता है।  तब कार का सफर भी अच्छा नहीं लगता। अब डॉक्टर रमेश के मन में पैदा हुई है एक ऐसी इच्छा जो पूरे समाज का भला कर सकती है। उनके मन ने चाहा कि बाल दिवस मनाया जाये। मन की यह चाहत यूं ही नहीं थी। किसी भले मनुष्य के अंदर ही कोई भला आईडिया आता है। लोगों को आँखों की रौशनी देते देते डॉक्टर रमेश ने सोचा समाज की सोच का अंधापन  भी ज़रूरी है। आखिर क्यों होते हैं समाज में दंगे फसाद। जिस धर्म ने सिखाया उस धर्म के नाम पर कत्लोगारत क्यों होती हैं? क्यों बुझा दिए जाते हैं अनगिनत घरों के चिराग बिना किसी कारण? डॉक्टर रमेश ने एक दूरगामी योजना पर काम शुरू किया। यह आयोजन उसी योजना की शुरुआत है। 
पुनरजोत टीम की तरफ से आयोजित बाल दिवस कार्यक्रम में सभी धर्मों के बच्चों को बुलाया गया। उनके साथ ही मस्जिद से मौलवी और मन्दिर से पुजारी जी भी आये। सिख धर्म और ईसाई  धर्म के प्रतिनिधि भी बच्चे लेकर आये। सभी ने मिल कर डांस किया। गीत गाये और झूमते झूमते एक दुसरे के दोस्त बन गए। 
इस सारे कार्यकम की केंद्रीय पात्र थी पुनरजोत की दादी अर्थात डाक्टर शकुन्तला यादव जो इस समय 80 वर्ष की हैं। इस उम्र के बावजूद वह बहुत ही उत्साह के साथ डॉक्टर रमेश के इस आयजन में शामिल हुईं। यह केवल एक दिन का आयोजन नहीं था। यह एक कार्य योजना की शुरुआत है। वर्ष 2030 तक एक ऐसी नई पीढी को शिक्षित करने का संकल्प जो एक न्य समाज बना सके। अनुमान लगाइए कैसा होगा 15 वर्ष के बाद वो समाज जिसकी यह पीढी बढ़ी हो कर उन लोगों के इशारों पर दंगे फसाद करने से साफ़ इंकार कर देगी जो अपने स्वार्थ के लिए लोगों को आपस में लड़वाते रहते हैं। दंगे फसादों के खिलाफ एक शिक्षित समाज के मानवीय दिवार जिसे मज़बूत बनाने में वो सभी लोग शामिल होंगें जो इंसानियत को अपना धर्म मानते होंगें। 

Wednesday, October 14, 2015

मन का संसार ------ एक नया रंग

मन , मन से भाव है कल्पना का संसार सपनो की दुनिया।  जहाँ  हमारी कल्पना शक्ति इतनी उँची उड़ती है कि  हमारे ख्याल , हमारे भाव आसमान से भी ऊपर उड़ जाते है।  कभी यह भाव किसी अपूर्ण इच्छा की पूर्ति का होता है , तो कभी कुछ और।  कभी सूर्य के उजाले में भी , खुली आँखों में भी , हम सपने देखते  है। कभी हम उस प्रभु  की मोह माया में ही खो जाते है।  कभी मन ही मन उसके कार्यो  के लिए  उसका शुक्रिया करते है।  तभी तो कहा गया है कि  -------------------------
मन ही देवता , मन ही ईशवर , मन से बड़ा न कोए।  

 मन उजियारा जब जब फैले  जग उजियारा होए।  

इसलिए  तो कहा भी जाता है कि इस शरीर में भगवान  का वास होता है।  अब आज के लिए बस इतना ही।  फिर मिलेंगे ,किसी नयी सोच के साथ।  

Friday, May 31, 2013

मन का खेल

बहाने पर बनाता है बहाना बना कर छोड़ेगा मुझको दीवाना 
गर्मी ने जान निकाल रखी थी। हर रोज़ पढने के लिए जाना किसी पहाड़ से कम न लगता। रोज़ गुस्सा आता कि पता नहीं कब होंगी स्कूल में गर्मी की छुट्टियाँ। घर बदलने के बाद उसी पुराने स्कूल से मोह भी नहीं छूट रहा था और इतनी दूर हर रोज़ जाने के लिए न आसानी से रिक्शा मिलता न ही कुछ और। ऐसी हालत में बार बार यही लगता कि गर्मियों की छुट्टियाँ होंगीं तो सब ठीक हो जायेगा। मन में तरह तरह के कार्यक्रम बन रहे थे कि अबकी बार कहाँ जाना है? मां डल्होजी जाने की बात कर रही थी और पापा धर्मशाला जाने की बात करते रहते थे। सहेलियाँ शिमला जाने की बातें करतीं तो मन झट से ऊंचे बर्फीले पहाड़ों के नजारों में खो जाता। बड़ी बहन मुम्बई जाने की बात करती तो नानी मां वैष्णो देवी जाने का उपदेश देती तरह तरह के ख्याल मन में चलते रहते साथ ही चलती ख्यालों में एक यात्रा। आखिर कर छुट्टियाँ भी हो गयी। मन कितनी तेज़ी से रंग बदलता है इसका अहसास आज फिर हुआ। पहली छुट्टी थी मन में इसे मजेदार बनाने की स्कीमे सोचना अच्छा लगता था कि सुबह हुयी---दोपहर हुयी--फिर शाम और फिर रात। पहली बार महसूस हुआ कि स्कूल जाना कितना अच्छा होता है। अब समझ नहीं आता की बोरियत से भरा यह महीना कैसे निकलेगा। साथ ही पता चला एक रहस्य कि मन बहुत तेज़ी से भागता है किसी नए रस्ते पर--किसी नई मंजिल की तरफ। जो पास होता है उसे भूल जाता है और जो  होता है भागता है। दिल करता है की इस बार की छुट्टियाँ मन के इस विज्ञानं को समझने में ही लगाई जायें। इस लिए जो जो महसूस होता रहेगा वह मैं आपको बताती रहूंगी। इसके साथ ही चलेगा तन को पूरी तरह तंदरुस्त और मजबूत बनाने का सिलसिला। इसके साथ ही होगा मन जीते जगजीत का थोडा सा अभियास और। आपको कैसी लगी मेरी छुट्टियाँ  बताने की योजना। आपकी योजना क्या है? उचित लगे तो अवश्य बताना! --कार्तिका

Sunday, April 28, 2013

मन का मनका फेर

जिस बात को मन तैयार हो वहां मुश्किल भी मुश्किल नहीं लगती
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कभी कबीर जी ने कहा था 
माला फेरत जग भया 
गया न मन का फेर रे 
हाथ का मनका छाडि दे मन का मनका फेर रे 
इस बात को कितना ही समय बीत गया----कबीर जी ने कितने ही पते की बात कही थी पर मन का मनका हमारे हाथ ही नहीं आता---जी हाँ अक्सर ऐसा ही कहा जाता है---आपने कई बार महसूस किया होगा कि अगर मन खिन जाने का हो तो तन को कितनी ही थकान क्यूं न हो---मौसम भी कितना ही खराब क्यूं न हो----इंसान उस रास्ते पर कदम बढ़ा ही लेता है---पर अगर कहीं जाने के मामले में मन राज़ी न हो और जाना पढ़ जाये तो कभी सर में दर्द जाग उठता है तो कभी पीठ में दर्द---कभी बुखार महसूस होने लगता है और कभी कुछ और---हमने हाल ही में अपना घर शिफ्ट किया---अर्थात एक इलाका छोड़ कर किसी दुसरे इलाके में पहुँच गए----दिल कहो या मन--वह नहीं लग रहा था इसलिए वहां का मकान सुंदर होने के बावजूद भी अच्छा नहीं लग रहा था---मुझे बार बार याद आता वही पुराना मकान----कच्चा सा---टूटता हुआ---गिरता हुआ----बरसात में चोता हुआ-----
इसी तरह मुझे पुराना स्कूल याद आता---और  जिद   उसी पुराने स्कूल में दाखिला लिया---हालांकि इस जिद को  करने के लिए हर रोज़ कुछ किलोमीटर जाना और फिर वहां से वापिस  आना आसान नहीं था----पर मैंने सब किया---मन राज़ी था तो न थकान महसूस होती थी न ही बरसात---न ही धूप----इस तरह कई दिन चलने के बाद बाबा शेख फरीद जी का श्लोक समझ में आया---
गलियें चिक्कड़ दूर घर नालि प्यारे नेहुं, 
चलां तां भिज्जे कम्बली, रहां तां टुटे नेहुं ---बरसात है…गली गली  दूर तक कीचड़ से भरी हैं---चलूँ तो कपड़े खराब हो जायेंगे और अगर रुकूँ तो प्रेम टूटता है---फिर खुद ही फैसला देते हैं---
भिज्जौ सिज्जौ कम्बली-अल्लाहु वर्षों मीहुं 
 जाये मिलन तिनं सज्जना टुटे नहीं नेहुं 
आखिर में एक बात---अगर म्न्कुछ कहे तो तन झट से उसका कहा मान लेता है----कभी आनाकानी नहीं---इसलिए मन हमेशां अच्छा ही कहे इसके कुच्छ रास्ते हैं जिनकी चर्चा किसी अगली पोस्ट में----कार्तिका सिंह 

Wednesday, April 10, 2013

तोरा मन दर्पण कहलाये

मन ही देवता, मन ही ईश्वर, मन से बड़ा न कोय
मन उजियारा जब जब फैले, जग उजियारा होय

तोरा मन दर्पण कहलाये मेरे अनुभव मेरे हैं---और आपके अनुभव आपके रहेंगे----इनमें कम या अधिक अंतर हो सकता है---यहाँ इन्हें पूरी ईमानदारी से प्रस्तुत किया जायेगा तांकि मन की दुनिया के राज़ हम सब बाँट सकें----श्री गुरुनानक देव जी ने कहा था---मन जीते जगजीत----बस यह ब्लॉग इसी मकसद की याद दिलाता रहे इसका हर सम्भव प्रयास रहेगा---कार्तिका सिंह 
प्राणी अपने प्रभु से पूछे किस विधी पाऊँ तोहे
प्रभु कहे तु मन को पा ले, पा जयेगा मोहे

तोरा मन दर्पण कहलाये \- २
भले बुरे सारे कर्मों को, देखे और दिखाये
तोरा मन दर्पण कहलाये \- २

मन ही देवता, मन ही ईश्वर, मन से बड़ा न कोय
मन उजियारा जब जब फैले, जग उजियारा होय
इस उजले दर्पण पे प्राणी, धूल न जमने पाये
तोरा मन दर्पण कहलाये \- २

सुख की कलियाँ, दुख के कांटे, मन सबका आधार
मन से कोई बात छुपे ना, मन के नैन हज़ार
जग से चाहे भाग लो कोई, मन से भाग न पाये
तोरा मन दर्पण कहलाये \- २

तन की दौलत ढलती छाया मन का धन अनमोल
तन के कारण मन के धन को मत माटि मेइन रौंद
मन की क़दर भुलानेवाला वीराँ जनम गवाये
तोरा मन दर्पण कहलाये \- २