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Sunday, April 28, 2013

मन का मनका फेर

जिस बात को मन तैयार हो वहां मुश्किल भी मुश्किल नहीं लगती
Courtesy photo
कभी कबीर जी ने कहा था 
माला फेरत जग भया 
गया न मन का फेर रे 
हाथ का मनका छाडि दे मन का मनका फेर रे 
इस बात को कितना ही समय बीत गया----कबीर जी ने कितने ही पते की बात कही थी पर मन का मनका हमारे हाथ ही नहीं आता---जी हाँ अक्सर ऐसा ही कहा जाता है---आपने कई बार महसूस किया होगा कि अगर मन खिन जाने का हो तो तन को कितनी ही थकान क्यूं न हो---मौसम भी कितना ही खराब क्यूं न हो----इंसान उस रास्ते पर कदम बढ़ा ही लेता है---पर अगर कहीं जाने के मामले में मन राज़ी न हो और जाना पढ़ जाये तो कभी सर में दर्द जाग उठता है तो कभी पीठ में दर्द---कभी बुखार महसूस होने लगता है और कभी कुछ और---हमने हाल ही में अपना घर शिफ्ट किया---अर्थात एक इलाका छोड़ कर किसी दुसरे इलाके में पहुँच गए----दिल कहो या मन--वह नहीं लग रहा था इसलिए वहां का मकान सुंदर होने के बावजूद भी अच्छा नहीं लग रहा था---मुझे बार बार याद आता वही पुराना मकान----कच्चा सा---टूटता हुआ---गिरता हुआ----बरसात में चोता हुआ-----
इसी तरह मुझे पुराना स्कूल याद आता---और  जिद   उसी पुराने स्कूल में दाखिला लिया---हालांकि इस जिद को  करने के लिए हर रोज़ कुछ किलोमीटर जाना और फिर वहां से वापिस  आना आसान नहीं था----पर मैंने सब किया---मन राज़ी था तो न थकान महसूस होती थी न ही बरसात---न ही धूप----इस तरह कई दिन चलने के बाद बाबा शेख फरीद जी का श्लोक समझ में आया---
गलियें चिक्कड़ दूर घर नालि प्यारे नेहुं, 
चलां तां भिज्जे कम्बली, रहां तां टुटे नेहुं ---बरसात है…गली गली  दूर तक कीचड़ से भरी हैं---चलूँ तो कपड़े खराब हो जायेंगे और अगर रुकूँ तो प्रेम टूटता है---फिर खुद ही फैसला देते हैं---
भिज्जौ सिज्जौ कम्बली-अल्लाहु वर्षों मीहुं 
 जाये मिलन तिनं सज्जना टुटे नहीं नेहुं 
आखिर में एक बात---अगर म्न्कुछ कहे तो तन झट से उसका कहा मान लेता है----कभी आनाकानी नहीं---इसलिए मन हमेशां अच्छा ही कहे इसके कुच्छ रास्ते हैं जिनकी चर्चा किसी अगली पोस्ट में----कार्तिका सिंह 

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