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Monday, November 14, 2016

बाल दिवस पर डॉक्टर रमेश ने की एक अनोखी पहल

सन 2030 तक दंगे फसादों से मुक्त समाज बनाने का शुभारम्भ 
लुधियाना: 14 नवम्बर 2016: (कार्तिका सिंह//मन की दुनिया मन के रंग)
बहुत बड़ी शक्ति छुपी है मन में। मन जो चाहे करने की क्षमता रखता है। इसे जीत लिया जाये तो दुनिया जीतने की क्षमता पैदा हो जाती है। मन किसी से मिलना चाहे तो तन बरसात में भी उठ कर उसका साथ देता है और चल पड़ता है मिलने।  रास्ते का कीचड़ और  बारिश का  कुछ कहता। अगर मन न मिलना चाहे तो तन भी बीमार हो सकता है।  तब कार का सफर भी अच्छा नहीं लगता। अब डॉक्टर रमेश के मन में पैदा हुई है एक ऐसी इच्छा जो पूरे समाज का भला कर सकती है। उनके मन ने चाहा कि बाल दिवस मनाया जाये। मन की यह चाहत यूं ही नहीं थी। किसी भले मनुष्य के अंदर ही कोई भला आईडिया आता है। लोगों को आँखों की रौशनी देते देते डॉक्टर रमेश ने सोचा समाज की सोच का अंधापन  भी ज़रूरी है। आखिर क्यों होते हैं समाज में दंगे फसाद। जिस धर्म ने सिखाया उस धर्म के नाम पर कत्लोगारत क्यों होती हैं? क्यों बुझा दिए जाते हैं अनगिनत घरों के चिराग बिना किसी कारण? डॉक्टर रमेश ने एक दूरगामी योजना पर काम शुरू किया। यह आयोजन उसी योजना की शुरुआत है। 
पुनरजोत टीम की तरफ से आयोजित बाल दिवस कार्यक्रम में सभी धर्मों के बच्चों को बुलाया गया। उनके साथ ही मस्जिद से मौलवी और मन्दिर से पुजारी जी भी आये। सिख धर्म और ईसाई  धर्म के प्रतिनिधि भी बच्चे लेकर आये। सभी ने मिल कर डांस किया। गीत गाये और झूमते झूमते एक दुसरे के दोस्त बन गए। 
इस सारे कार्यकम की केंद्रीय पात्र थी पुनरजोत की दादी अर्थात डाक्टर शकुन्तला यादव जो इस समय 80 वर्ष की हैं। इस उम्र के बावजूद वह बहुत ही उत्साह के साथ डॉक्टर रमेश के इस आयजन में शामिल हुईं। यह केवल एक दिन का आयोजन नहीं था। यह एक कार्य योजना की शुरुआत है। वर्ष 2030 तक एक ऐसी नई पीढी को शिक्षित करने का संकल्प जो एक न्य समाज बना सके। अनुमान लगाइए कैसा होगा 15 वर्ष के बाद वो समाज जिसकी यह पीढी बढ़ी हो कर उन लोगों के इशारों पर दंगे फसाद करने से साफ़ इंकार कर देगी जो अपने स्वार्थ के लिए लोगों को आपस में लड़वाते रहते हैं। दंगे फसादों के खिलाफ एक शिक्षित समाज के मानवीय दिवार जिसे मज़बूत बनाने में वो सभी लोग शामिल होंगें जो इंसानियत को अपना धर्म मानते होंगें। 

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