Showing posts with label Ludhiana. Show all posts
Showing posts with label Ludhiana. Show all posts

Sunday, December 8, 2019

बहुत कुछ देखा है इस चौंक ने लुधियाना में

पविलियन चौंक ही कभी सेशन चौक हुआ करता था 
लुधियाना: 8 दिसंबर 2019: (कार्तिका सिंह// मन की दुनिया-मन के रंग)::
यह लिखा है आई लव लुधियाना। स्थान है पविलियन माल। इसी स्थान पर कभी अलुमिनियम का एक बैंच लगा होता था। थके मंडे लोग कुछ पल के लिए यहां बैठ जाते। मैन भी यहां कई बार बैठ कर देखा। मकसद होता था अतीत के दृश्य को मन की आंखों से देखना, समझना और महसूस करना। गुज़रे चुके वक़्त को दोबारा बुलाने जैसा मानसिक प्रयोग भी कह सकते हैं आप। गुज़रा हुआ ज़माना मेरे मन से निकली उन खामोश आवाज़ों को सुन भी लिया करता था। वही चाय की दुकानों से आती आवाज़ें। समोसा-तिकी बेचने वालों की आवाज़ें। आसपास बने छोटे छोटे ढाबों की आवाज़ें। कोशिश करो तो अब भी सुनाई देती हैं वे सब आवाज़ें। 
आपको याद हो न हो यह वही स्थान है जहां कभी सेशन कोर्ट हुआ करती थी। इस चौंक का नाम सेशन चौंक हुआ करता था। लोग इसे पुरानी कचहरी चौंक भी बोला करते। हर रोज़ सुबह से ही यहां अदालती झगड़ों में उलझे लोगों की भीड़ सी जमा हो जाती। इंसाफ पाने की उम्मीद बहुत से पीड़ित लोगों को अदालत में ले आती। यह बात अलग है उन्हें अक्सर हर बार नई तारीख ही मिलती। देश में आज़ादी आने के बाद जन्मी पीढ़ियों ने भी इस अदालत के सीन देखे और उनके बज़ुर्गों ने भी। आतंकवाद के दौरान यहां गोलियां भी चलीं जब खालिस्तानी संगठनों ने अपने एक खास सदस्य को छुड़वा लिया था। बजुर्ग लोग बताते हैं कि उस दिन सभी सन्न रह गए। हम लोग गोलिओं की आवाज़ सुनते ही ज़मीन पर लेट गए। गोलियां कुछ मिनटों तक चलती रहीं।  सनसनी सी छायी रही। अगले दिन फायरिंग की यही घटना अखबारों की हेड लाईन बनी।
इस तरह बहुत सी यादें हैं जो घर परिवार के लोगों से पता चलती हैं। मैने खुद यहां पर अदालत का सीन नहीं देखा। बातें सुन कर इच्छा उठती कि काश अतीत भी किसी तरह आंखों के सामने आ जाया करे। अब तो वीडियो कैमरे भी आम हो गए हैं और वीडियो बना कर अनमोल दृश्यों को संभालने वाले लोग भी बहुत हो गए हैं। उन दिनों इस तरह का चलन आम नहीं था।
इसलिए यहां लगे बैंच पर बैठ कर अतीत को महसूस करना बहुत अच्छा लगता था। अब वह बैंच भी नहीं है। उसी स्थान पर लिखा है-आई लव लुधियाना। यह भी तो मेरे ही मन की आवाज़ है। अतीत के अनुभव कराने वाला यह स्थान मुझे आज भी बहुत अच्छा लगता है।-- कार्तिका सिंह

कांटों से निभाना सीख लो फिर फूल ही फूल खिलते रहेंगे

यकीन न हो तो आज़मा कर देख लो-सच में मान जाओगे 
लुधियाना: 8 दिसंबर 2019: (कार्तिका सिंह//मन की दुनिया-मन के रंग)::
कैक्टस गार्डन का होना मेरे लिए सचमुच किसी हैरानी से कम नहीं था। जब मैंने सुना कि बाकायदा इस नाम का एक बाग़ मौजूद है तो मैंने इस जा कर देखने का मन बनाया। बेहद हैरानी थी की कोई कांटों से इतना प्रेम कैसे कर सकता है। फिर याद आयीं कुछ पंक्तियां। कभी किसी शायर ने लिखा था:
गुलों से खार बेहतर हैं जो दामन थाम लेते हैं! दरअसल कैक्टस गार्डन की चर्चा सुनी पीएयू के गुलदाउदी शो में जो 3 और 4 दिसम्बर को था। समाप्त हो रहे वर्ष 2019 को महकते अंदाज़ में विदा कहने का एक यादगारी अंदाज़ जिसे केवल पीएयू की मैनेजमेंट ही जानती है। इसी गुलदाउदी शो में एक स्टाल एक ऐसे व्यक्ति का भी था जिसने कांटेदार पौदों को बहुत अच्छे ढंग से सजाया हुआ था और वह कैक्टस के इन पौदों को 200/-रुपये प्रति गमला के हिसाब से बेच रहा था। इन छोटे छोटे गमलों को ड्राईंग रूम में रखने के काम लाया जाता है। इनको पानी चाहिए बहुत ही थोड़ा सा और वह भी महीने में दो बार।
इसी गुलदाउदी शो में मुझे पता चला कि कैक्टस गार्डन का नाम अब बदल जा चुका है। अब इसका नाम बदलकर राष्ट्रीय कैक्टस और सस्कुलेट बॉटनिकल गार्डन और रिसर्च सेंटर रखा गया है, जोकी चंडीगढ़ के सैटेलाइट शहर पंचकूला के केंद्र में स्थित है। अजीब इतफ़ाक़ है कि चंडीगढ़ को पत्थरों का शहर कहा जाता है और यहां का रॉक गार्डन सचमुच बहुत लुभावना है। अब पंचकूला का कैक्टस गर्दन भी बहुत लोकप्रिय है। उन काँटों की बात करता हुआ जो सिर्फ चुभते ही नहीं बल्कि फूलों की रक्षा भी करते हैं। इस उद्यान के विकास के पीछे उद्देश्य कैक्टस और सुकुलुओं की लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण और संरक्षण के साथ-साथ पर्यटकों को आकर्षित करना था। सात एकड़ जमीन के क्षेत्र में फैला हुआ यह एशिया के सबसे बड़े आउटडोर भू-भाग के कैक्टस और सूक्कुल गार्डन के रूप में माना जाता है जिसमें 2500 से अधिक प्रजातियों के कैक्टस और सुकुलेंट हैं। यहां कई तरह के कांटेदार पौदे हैं। फिर भी यहां कोई कांटा किसी हसीना को उस तरह नहीं चुभता कि उसे अपने प्रेमी को आवाज़ लगानी पड़े। दिलचस्प बात है कि लिखने वालों ने हिंदी और पंजाबी दोनो में ही कांटों पर बहुत एच्गीहके रुमान्टिक गीत लिखे हैं। इस गार्डन में भारतीय सुकलों का एक व्यापक संग्रह है, जो दुनिया में सबसे बड़ा है, इनमें से कुछ बहुत दुर्लभ हैं और पहले से ही लुप्तप्राय प्रजातियों के रूप में घोषित कर चुके हैं, जिसमें भारतीय मूल के जीनस कार्लुमा का पूरा संग्रह शामिल है। बगीचे में तीन हरे घरों का घर है कैक्टस और सुकुलु भी औषधीय मूल्यों के लिए जाना जाता है क्योंकि सदियों से भारतीय शर्करा का उपयोग आयुर्वेद और यूनानी दवाओं में किया जा रहा है। यह न केवल पर्यटकों के लिए बल्कि वनस्पतिविदों के लिए आकर्षण का एक बड़ा स्रोत है। यह पार्क अप्रैल से सितंबर के बीच मे सुबह 9 से 1 बजे तक और शाम 3 से 7 बजे तक तथा अक्तुबर से मार्च तक सुबह 9 बजे से 1 बजे तक और शाम 2 से 6 बजे तक खुला रहता है। इसका प्रवेश शुल्क 10 रु प्रति व्यक्ति है। मेरा इरादा है इस वर्ष के अंत में जब एग्ज़ाम समाप्त हो जाएंगे तो क्रिसमिस की छुट्टियों को इस गार्डन में जा कर यादगारी बबय जाए। इसके बाद मिलेंगे कुछ नई तस्वीरें लेकर।

Monday, July 15, 2019

एक अनकही मुलाकात--संजीत कौर के साथ

वह अंतरंग मुलाकात--जो अब भी जारी है 
कभी लिखा था कि.....
मिलती हैं जो ठोकरे राह ऐ ज़िन्दगी में, 
कभी कभी उन्हें खा कर रुक जाना ही बेहतर है. 
न जाने रचियता का,
किस और मुड़ने का इशारा हो..!
संजीत के साथ कुछ पल कैमरे के सामने 
अब इन्ही पंक्तियों के क़दमों पे चलते हुए, रुक गयी हु, तो मन पीछे भाग रहा है..... क्या हुआ, क्या नहीं होना चाहिए था, ऐसा क्यों हुआ, वैसा क्यों हुआ वगैरा वगैरा। कौन  लोग आये ज़िन्दगी, क्यों आये, कई क्यों चले गए।  सब कुछ जैसे इस आराम के क्षण में ही दिलो-दिमाग में आना था।  पर करू भी तो क्या... ये दिल है भी अपना ही....... रोके नहीं रुकता।  लोगो के बारे में सोचते हुए..... कब बात औरतों की ओर चली गयी पता ही नहीं लगा। महिला दिवस की एक दिन की मुबारक बात, सोचने को मज़बूर करती है कि क्या बाकी बचे 364 दिन औरत को लूटने के लिए ही बने है? क्यों ये समाज कभी औरत को निचे गिरा देता तो कभी भगवान से भी ऊपर उठा देता है। ये समाज, ये लोग क्यों नहीं सोचते की ज़िन्दगी की गाड़ी औरत और मर्द नामक दो पहियों पर ही चल सकती है।  खैर ये तो थे मेरे विचार।  लेकिन जब मैं महिला सशक्तिकरण के बारे में सोचती हू, तो अनगिनत उदहारण मेरे पलकों में समां जाते है।  की क्या क्या किया है औरतों ने।  घूरती हुई नज़रों से बचते हुए, समाज की जंजीरों को तोड़ते हुए, पर भी अपने अंदर की ममता को संभाले हुए, कभी  मैं भी कभी इस तरह की कोई उदहारण बन पायूँगी ? पता नहीं, लेकिन ऐसी एक उद्धरण को मैं हर रोज़ अपनी आँखों के सामने देखती हूँ।  एक लड़की कितनी मज़बूत हो सकती हैं..,.. इस की ज़िंदा मिसाल से मैं हर रोज़ बात करती हूँ..... खाना कहती हूँ, हंसती-बोलती हूँ।  सोच कर आश्चर्य होता है , लेकिन ये सच है।  हमारे कॉलेज की बहुत ही अच्छी, होनहार, होंसले वाली, कभी हार न मानने वाली, हर कदम पर मुसीबत से टक्कर लेने वाली  एक लड़की संजीत कौर।  वैसे है तो मेरी प्रिय सखी, लेकिन उस के कामों ने उसे बहुत ऊँचा उठा दिया हैं ..लेकिन  कदम अब भी ज़मीन पर ही हैं।  आसमानों तक पहुंच करके भी उसने ज़मीन नहीं छोड़ी। राजपथ पर राष्ट्रपति सहित अनेक मशहूर लोगो से मिलने के बावजूद भी ..... हमसे वो उसी तरह मिलती है जिस तरह पहले  मिलती थी..... उतने ही प्यार और पागलपन के साथ।  उसकी तारीफ में मैं क्या कहूं....... लेकिन एक गीत मेरे ज़हन में आ रहा है ...फिल्म अकीरा का गीत..... उस गीत की चंद लाइनें उसे समर्पित ज़रूर कर सकती हूँ। 
आगे आगे रस्ते नए,
नए मोड़ सारे ,
न तू कभी घबरा रे,
चले जा अकेले तू अपने ही दम पे,
तेरा हमसफ़र हौंसला रे......... 
रास्ते फ़िलहाल एक से लगते हैं लेकिन कब अलग हो जाएं कुछ कहा नहीं जा सकता। कब मंज़िलें बदल जाएं-कुछ कहा नहीं जा सकता। ज़िंदगी के संघर्षों में बहुत कुछ बदल सकता है।  शायद उस बदलाव को रोक पाना सम्भव भी नहीं होता। कई बार ये बदलाव इतने प्राकृतिक होते हैं कि इन्हें रोकना चाहिए भी नहीं। इस हकीकत के बावजूद मन में एक आकांक्षा बनी रहती है कि हमारा दिल अगर किसी मोड़ पर आ कर न भी मिले तो भी हमारा सुर तो मिला ही रहे।  उसकी मक्की की रोटी, सरसों का साग और उसकी मम्मी का प्यार मेरे लिए हमेशां ही मन में एक विशेष स्थान पर रहेगा। --कार्तिका सिंह 

Monday, September 11, 2017

जीना इसी का नाम है.....

पीएयू के सुसाईड प्रिवेंशन आयोजन ने सिखाये ज़िंदगी के असली गुर 
लुधियाना: 16 सितंबर 2017: (कार्तिका सिंह)::
मन की दुनिया अजीब दुनिया है;
रंग कितने ही यह बदलती है। 
यह पंक्तियाँ इन दिनों की अख़बार में छपी खबरें देख कर पहले मन में उठीं और फिर जुबां पर आयी। कहीं बेटा बाप की हत्या कर रहा है और कहीं कोई बेटा मां को कत्ल कर रहा है। पैसे की पूजा करने वाले पूंजीवाद में यही सब हो सकता है। रिश्तों और जज़्बातों की कदर पूँजी प्रधान युग में कहां! 
हां वहीँ कभी कभी अच्छीे ख़बरें भी आती हैं। वो लोग भी रिश्ते बनाते और निभाते हैं जिनका किसी से खून का कोई रिश्ता नहीं होता। दुनिया के इन बदलते चेहरों को देख कर ही अहसास होता है मन की शक्ति का। मन को वश में किया तो पैरों तले ज़माना और अगर मन के पीछे हो लिए तो कुछेक हालतों को छोड़ कर ज़माने के पैरों तले हम। जब भी किसी समाचार पत्र में किसी की आत्महत्या की खबर छपी नज़र आती तो मन विचलित हो उठता। किसी का मन किसी का दिमाग किसी को मौत की राह पर कैसे ले जाता है। कदम कदम पर फैले शोषण के जाल ने ऐसे बहुत से हालात बनाये हैं। ज़रा सोचो उस मानसिक स्थिति को जब कोई मरने का फैसला करता है। ज़रा सोचो कैसे कोई खुद की जान ले सकता है? आखिर क्यों महसूस होता है इतना गम, इतना दर्द जो जान ले कर हो हटता है।  कारण बाहरी भी हैं लेकिन मन की भूमिका बहुत बड़ी होती है। तभी कहा जाता है शायद---मन के जीते जीत है--मन के हारे हार। 
आत्म हत्यायों की खबरों से दिल और दिमाग दोनों परेशान थे। उदासी बढ़ रही थी। समझ नहीं आ रही थी कि किसी को आत्महत्या से कैसे रोका जा सकता है। इसी उधेड़बुन में पता चला कि पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी एक प्रतियोगिता करवा रही है कि आत्म हत्यायों को कैसे रोका जाये? इसकी जानकारी मिलने पर मन में ख़ुशी की एक लहर उठी। काव्य रचना की मन में छुपी भूली बिसरी चाहत सक्रिय हुयी और एक पंजाबी काव्य रचना लिखी गयी।
उन दिनों पंचकूला में डेरा सच्चा सौदा के विवाद को लेकर हिंसक हालात  बने हुए थे। इंटरनेट बंद था। इसलिए लगा कि मेरा तो इस प्रतियोगिता में भाग लेना ही मुश्किल। कार्यालय में छुट्टी थी और इंटरनेट बंद। बहुत ही बेबसी की हालत बनी हुई थी। तभी एक अच्छी खबर आई। ज़रा सा हालात ठीक होते ही पीएयू ने इस प्रतियोगिता की अंतिम तारीख बढ़ाने का ऐलान कर दिया। कालेज के प्रोफेसरों ने होंसला दिया। बस मुझे तो जान में जान आयी। लगा मुझे अब अवश्य ही भाग लेना चाहिए। बहुत बार मन को बदला भी। फिर दिल के किसी कोने से आवाज़ आती शायद कंसोलेशन या एपरीसेशन पुरस्कार ही मिल जाये। बस एक दम से वो पंजाबी रचना प्रतियोगिता में भेज दी। अब बेसब्री से इंतज़ार था प्रतियोगिता के परिणाम का। 
मुझे याद है कि जिस दिन यह परिणाम आया उस दिन भी मेरे पापा हिमाचल में थे। मुझ से रहा नहीं गया और व्हाटसप पर अपनी ख़ुशी पापा को बताई।  पापा भी बहुत खुश हुए। 
जिस दिन इन परिणामों की घोषणा हुयी वो दिन तो मेरे लिए अविस्मरणीय ही बन गया। कालेज की मेरी प्रोफेसर और प्रिंसिपल दोनों ही मुझे आशीर्वाद देने के लिए विशेष तौर पर आये हुए थे। इससे मेरी ख़ुशी भी चौगुनी हुई और गर्व भी। उसी कार्यक्रम में जब मेरी कविता को बहुत ही प्रभावशाली ढंग से स्टेज पर पढ़ा भी गया और स्क्रीन पर दिखाया भी गया तो मुझे बहुत ही प्रसन्नता हुयी।  इससे ज़्यादा ख़ुशी उस जानकारी की मिली जो शायद मुझे वहीँ पर मिल ही नहीं सकती थी। पत्रकारिता विभाग के डाक्टर सरबजीत सिंह और होम साइंस विभाग की मैडम जतिंदर कौर गुलाटी ने तो कमाल की बातें बतायीं जिनमें कमाल का जादू था। ऐसा जादू जो आत्महत्या के लिए जा रहे इंसान को वापिस ज़िंदगी के जोश में ले आये। 
इसी तरह जानमाने शायर पद्मश्री डाक्टर सुरजीत पात्र साहिब ने बहुत ही सच्चा सुच्चा और वैज्ञानिक तथ्य बताया कि  जैसे कोई भी खतरनाक ज़हर अगर बहुत से पानी में मिला दिया जाए तो उसकी मार्क क्षमता तकरीबन समाप्त जैसी ही हो जाती है। उन्होंने समझाया कि इसी तरह अगर हम अपने दर्द को ही सबसे बड़ा दर्द समझ कर गले लगाएंगे तो वो खतरनाक ज़हर ही बन जायेगा जो ख़ुदकुशी की तरफ जाता है। लेकिन अगर दुनिया भर के गम को या दूसरों के गम को भी अपने ही गम इन शामिल कर लिया जाये तो अचानक ही अपना गम का सागर बहुत छोटी सी बूंद जैसा बन जाता है। उसकी मार्कक्षमता समाप्त हो जाती है। पात्र साहिब के इस हिसाब किताब को सुन कर याद आया वह गीत----
                                                              किसी की मुस्कराहटों पे हो निसार, 
                                                              किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार,
                                                              किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार-----
                                                              जीना इसी का नाम है-----
तब से मेरी अंतर्मन की जो आंख केवल अपना ही दर्द देख रही थी वही आंख अब दूसरों के दर्द को भी देखने लगी। कुछ ही दिनों में मुझे अपना दर्द--अपना गम जो बहुत बड़ा लगता था अब एक तरह से भूल जैसा ही गया था।
उसी कार्यक्रम में डाक्टर सुखपाल साहिब का पेपर भी पढ़ा गया था। कमाल की जानकारी दी गयी इस खोज पत्र में। खुदकुशियों का इतना विस्तृत विवरण शायद किसी अख़बार में नहीं आया। खुदकुशियों के इस अभियान से जुड़ कर ही पता चला कि  वास्तव में मामला है क्या? मैं कोशिश करूंगी कि  इस पर जल्द ही कोई नयी पोस्ट लिखी जाये। फिलहाल इतना ही कि अपना सुःख  और दूसरों का दुःख बाटना आ जाये तभी पता चलता है-- जीना इसी का नाम है... 

Friday, May 31, 2013

मन का खेल

बहाने पर बनाता है बहाना बना कर छोड़ेगा मुझको दीवाना 
गर्मी ने जान निकाल रखी थी। हर रोज़ पढने के लिए जाना किसी पहाड़ से कम न लगता। रोज़ गुस्सा आता कि पता नहीं कब होंगी स्कूल में गर्मी की छुट्टियाँ। घर बदलने के बाद उसी पुराने स्कूल से मोह भी नहीं छूट रहा था और इतनी दूर हर रोज़ जाने के लिए न आसानी से रिक्शा मिलता न ही कुछ और। ऐसी हालत में बार बार यही लगता कि गर्मियों की छुट्टियाँ होंगीं तो सब ठीक हो जायेगा। मन में तरह तरह के कार्यक्रम बन रहे थे कि अबकी बार कहाँ जाना है? मां डल्होजी जाने की बात कर रही थी और पापा धर्मशाला जाने की बात करते रहते थे। सहेलियाँ शिमला जाने की बातें करतीं तो मन झट से ऊंचे बर्फीले पहाड़ों के नजारों में खो जाता। बड़ी बहन मुम्बई जाने की बात करती तो नानी मां वैष्णो देवी जाने का उपदेश देती। तरह तरह के ख्याल मन में चलते रहते साथ ही चलती ख्यालों में एक यात्रा। आखिर कर छुट्टियाँ भी हो गयी। मन कितनी तेज़ी से रंग बदलता है इसका अहसास आज फिर हुआ। पहली छुट्टी थी मन में इसे मजेदार बनाने की स्कीमे सोचना अच्छा लगता था कि सुबह हुयी---दोपहर हुयी--फिर शाम और फिर रात। पहली बार महसूस हुआ कि स्कूल जाना कितना अच्छा होता है। अब समझ नहीं आता की बोरियत से भरा यह महीना कैसे निकलेगा। साथ ही पता चला एक रहस्य कि मन बहुत तेज़ी से भागता है किसी नए रस्ते पर--किसी नई मंजिल की तरफ। जो पास होता है उसे भूल जाता है और जो  होता है भागता है। दिल करता है की इस बार की छुट्टियाँ मन के इस विज्ञानं को समझने में ही लगाई जायें। इस लिए जो जो महसूस होता रहेगा वह मैं आपको बताती रहूंगी। इसके साथ ही चलेगा तन को पूरी तरह तंदरुस्त और मजबूत बनाने का सिलसिला। इसके साथ ही होगा मन जीते जगजीत का थोडा सा अभियास और। आपको कैसी लगी मेरी छुट्टियाँ  बताने की योजना। आपकी योजना क्या है? उचित लगे तो अवश्य बताना! --कार्तिका

Wednesday, April 10, 2013

तोरा मन दर्पण कहलाये

मन ही देवता, मन ही ईश्वर, मन से बड़ा न कोय
मन उजियारा जब जब फैले, जग उजियारा होय

तोरा मन दर्पण कहलाये मेरे अनुभव मेरे हैं---और आपके अनुभव आपके रहेंगे----इनमें कम या अधिक अंतर हो सकता है---यहाँ इन्हें पूरी ईमानदारी से प्रस्तुत किया जायेगा तांकि मन की दुनिया के राज़ हम सब बाँट सकें----श्री गुरुनानक देव जी ने कहा था---मन जीते जगजीत----बस यह ब्लॉग इसी मकसद की याद दिलाता रहे इसका हर सम्भव प्रयास रहेगा---कार्तिका सिंह 
प्राणी अपने प्रभु से पूछे किस विधी पाऊँ तोहे
प्रभु कहे तु मन को पा ले, पा जयेगा मोहे

तोरा मन दर्पण कहलाये \- २
भले बुरे सारे कर्मों को, देखे और दिखाये
तोरा मन दर्पण कहलाये \- २

मन ही देवता, मन ही ईश्वर, मन से बड़ा न कोय
मन उजियारा जब जब फैले, जग उजियारा होय
इस उजले दर्पण पे प्राणी, धूल न जमने पाये
तोरा मन दर्पण कहलाये \- २

सुख की कलियाँ, दुख के कांटे, मन सबका आधार
मन से कोई बात छुपे ना, मन के नैन हज़ार
जग से चाहे भाग लो कोई, मन से भाग न पाये
तोरा मन दर्पण कहलाये \- २

तन की दौलत ढलती छाया मन का धन अनमोल
तन के कारण मन के धन को मत माटि मेइन रौंद
मन की क़दर भुलानेवाला वीराँ जनम गवाये
तोरा मन दर्पण कहलाये \- २